Thursday, December 10, 2015

स्‍कूल का 'तमाशा' और 'तमाशा' का स्‍कूल



जिंदगी भी कई बार किस तरह से आइना दिखाती है। पिछले शनिवार को अजीब इत्‍तेफाक हुआ। सुबह जादू के स्‍कूल गए, पैरेन्‍ट-टीचर-मीटिंग में, जिसे ओपन-हाउस भी कहते हैं। उम्‍मीद तो यही थी कि शिकायत सुनने को मिलेगी कि जादू बहुत मस्‍ती करते हैं, He is very naughty but he is good at studies. लेकिन इस बार दो टीचर्स ने एक ही बात कही, nowadays he is very quiet. He does very good behavior. मेरा माथा थोड़ा ठनका। इंग्लिश टीचर ने आश्‍चर्य भी जताया कि आजकल वो बड़ा शांत रहने लगा है। लेकिन मैथ टीचर, जो क्‍लास-टीचर भी है- इस बात से खुश थी कि जादू आजकल शांत बैठने लगा है। पहले उसकी मस्‍ती और शरारतों से पूरी क्‍लास डिस्‍टर्ब होती थी। जादू के साथ दो बच्‍चों का नाम और शामिल था। खुद तो फास्‍ट क्‍लास-वर्क कर लेता था, फिर दूसरों को डिस्‍टर्ब करता था।

दरअसल इसके पहले क्‍लास में शरारत और बाहर दौड़ने पर उसे कई बार छोटी-मोटी सज़ा मिली। जैसे हेड-डाउन करना या किसी कोने में खड़े कर दिये जाना। जबकि जादू को पढ़ाई के लिए हमेशा हर टीचर से स्‍टार और स्‍माइली मिलता रहा है। हर PTM में यही बात सुनने मिली कि पढ़ने में अच्‍छा है इसलिए हम लोग सज़ा वाली बात से ज्‍यादा परेशान नहीं होते थे लेकिन एक बार डायरी में रेड-रिमार्क लिखकर आया। मुद्दा ये था कि बच्‍चा आई-कार्ड से खेलता है और क्‍लास से बाहर वॉश-रूम तक दौड़कर ही जाता है। अपने प्‍लेस से अपने बेस्‍ट-फ्रेन्‍ड के पास बार-बार चला जाता था। इस एक रेड रिमार्क से हम दोनों परेशान-चिंतित। जादू के पापा को ज्‍यादा चिंता। हालांकि मुझे लगातार ये लगता है कि इतने छोटे बच्‍चे मस्‍ती और शरारत तो करेंगी ही........बहरहाल हम लोगों ने जादू को घुट्टी पिलाना शुरू कर दिया--'क्‍लास में अपनी जगह पर बैठो', 'क्‍लास में खेलो मत', 'टीचर की बात ध्‍यान से सुनो' वगैरह वगैरह। शायद जादू ने काफी हद तक हमारी आज्ञा और सलाहों का पालन भी किया। जबकि मुझे लगातार ये गिल्‍ट रहा कि बच्‍चे के साथ ये सब ज्‍यादती है। हम बच्‍चे पर ये सब कह कर प्रेशर डालते हैं और इससे उसका बचपन छिन रहा है। हमारी त्रासदी है कि स्‍कूल के मुताबिक़ हम शुरू से ही बच्‍चे को कल्‍चर में ढालने लगते हैं। तहज़ीब, शिष्‍टाचार का पाठ बहुत जल्‍दी पढ़ाने लगते हैं कि कहीं हमारा बच्‍चा सभ्‍यता और आधुनिकता की सीढ़ी चढ़ने में या 'गुड बॉय' बनने में पीछे ना रह जाए। मध्‍यमवर्गीय सोच, स्‍कूल की संस्‍कृति, पहनावा, पश्चिमीकरण में बिल्‍कुल फिट हो अपना बच्‍चा। दोहरी मानसिकता और दोहरे मानदंड के बीच हमें अकसर अपने मूल संस्‍कारों का गला घोंटना पड़ता है। हम जानते समझते हुए भी अपने बच्‍चे को आधुनकिता की अंधी दौड़ में शामिल होने के गुर पहली क्‍लास क्‍या, नर्सरी से ही सिखाने लगते हैं। फिर भी मेरा मन हमेशा कहता है कि बच्‍चे पर ज़रूरत से ज्‍यादा कल्‍चर, एटीकेट थोपना उनसे उनका बचपन छीनना है। 

बहरहाल... इस PTM में जादू की भूरि-भूरि प्रशंसा सुनकर जी जुड़ा गया। जबकि उनकी साइंस मिस ने ये भी कहा कि मुझे तो हाइपर-एक्टिव बच्‍चे ज्‍यादा पसंद हैं इसलिए जादू उनका फेवरेट है। वो उनकी हर बात एक बार में समझ लेता है और जब वो दूसरी-तीसरी बार समझाती हैं- तो इस बीच जादू खिड़की से बाहर देखता है, पेन्सिल शार्प करता है या अपने आप में मगन हो जाता है। क्‍योंकि टीचर का दूसरी-तीसरी बार बोलना जादू के लिए बेकार है। उसे एक ही बार में पूरी जानकारी मिल जाती है। इस बात से टीचर खुश है। बाक़ी समय वो अपनी दुनिया में मगन है। मैं तो स्‍कूल से निहाल होकर लौटी लेकिन ये क्‍या......

शाम को गये 'तमाशा' देखने। 'तमाशा' ने तो असली तमाशा दिखा गया। मन के कई तार झंकृत कर दिये। दिमाग़ के कई दरवाज़े खोल दिये। इस फिल्‍म ने हम सबकी शख्सियत को बड़ी बारीकी से आइना दिखा दिया। बच्‍चे के जिस मनोविज्ञान को हम कभी जानने की कोशिश भी नहीं करते, वो मनोविज्ञान कितना विशाल है। बच्‍चे के मन का आकाश कितना बड़ा और कितना विस्‍तृत है। उनमें कितनी समझदारी है। फिर भी हम उस पर थोपते हैं सब कुछ। सब कुछ थोपकर अपनी बात मनवा लेते हैं.... खैर 'तमाशा' की विवेचना करने चले तो हमारी ये लेखनी बहुत बड़ी हो जाएगी। इसलिए बस इतना कहना चाहूंगी कि बड़ी बारीकी से हम सबकी जिंदगी के तमाशे को दिखाया गया है इसमें। वेद का किरदार हम सब भी रोज़ अदा करते हैं लेकिन तारा के बारीक जज्‍बात को बहुत कम ही लोग समझ पाते हैं।

इम्तियाज़ अली की 'तमाशा' ने बड़ी खूबसूरती से हम सबके बचपन को ताज़ा किया है... किस्‍सगोई के शौक़ को ताजा किया है। बड़ी समझदारी और कुशलता से ये भी संदेश दिया है कि मत कुचलो बचपन की मासूमियत। बच्‍चों पर अपनी काबलियत को मत थोपो। बच्‍चों को व्‍यावहारिकता, शिष्‍टाचार के फ्रेम में मत क़ैद करो। वरना वो जीती-जागती तस्‍वीर बन जाएंगे। एक ऐसा पुतला जो सपने में भी सॉरी थैंक्‍यू का पाठ पढ़ते नज़र आयेगा। जहां इस बात का तनाव भी है कि अब बड़े होकर उन्‍हें अच्‍छे मैनर सीखने चाहिए। सबसे अहम बात ये है कि अपने बचपन को अपने आप से कभी जुदा ना करो। फिल्‍म 'तमाशा' की तारीफ में क्‍या कहूं.... इस फिल्‍म को देखने के बाद मैंने ये तय किया है कि खुद के बचपन को संभालकर रखूंगी बल्कि नन्‍हे जादू को उड़ने के लिए वृहद आकाश दूंगी। अपनी कल्‍पनाओं को बुनने का स्‍पेस दूंगी। 'गुड बॉय' का भारी-भरकम कोट पहनाकर 'कल्‍चर' और 'एटीकेट' के दायरे में क़ैद नहीं करना है अपने जादू को। उसे बस मस्‍त रहने देना है। 'हाइपर' और 'नॉटी' का टैग जादू के साथ जोड़े रखना है।


  

Saturday, November 28, 2015

नैहर और ससुराल की स्‍मृतियां




ओ मायानगरी मुंबई, तुमने बहुत कुछ दिया है। पूरी जिंदगी दे दी है तुमने। शुक्रगुज़ार हैं तुम्‍हारे।

लेकिन फिर भी ना जाने क्‍या है बचपन वाले उस शहर में कि बार बार अपनी तरफ खींचता है वो शहर। गंगा मैया में प्रदूषण लाख घुल-मिल गया हो, लेकिन उसने अपनी पवित्रता आज भी कायम रखी है। इस बार जब इलाहाबाद गए, तो मन आकुल था गंगा-जमना और सरस्‍वती से मिलने को। इन तीनों बहनों के जल-स्‍पर्श से मन प्रसन्‍नता से लबालब भर गया।


ढलती शाम में जब नौका-विहार किया तो आसमान और जमना के जल के बीच गोलाई में अठखेलियां करता सूरज ज़ेहन में बस गया। डूबते सूरज के साथ  यमुना के पानी में जैसे किसी ने नारंगी रंग घोल दिया हो। जमुना पर बने नए ब्रिज की सैर की कशिश बार-बार बुलाती रही। बड़ा ही भला लगता है वहां बैठना।





लोकनाथ की मलाईदार लस्‍सी में अब भी वही मिठास है। वहां की दही-जलेबी, खस्‍ता दम-आलू, समोसे और चाट देखकर अब भी मुंह में पानी आ जाता है। आनंद भवन लोगों के लिए अभी भी आकर्षण का केंद्र है। आनंद भवन से जुड़ी एक सड़क इलाहाबाद विश्‍व-विद्यालय की ओर जाती है और अभी भी वैसे ही गुले-गुलज़ार है। अभी भी ठिए के सामने खड़े होकर लड़कियां चुरमुरा खाती नज़र आईं।





काफी बदल गया है इलाहाबाद। प्रगति के बहुत सारे सोपान तय किये हैं इलाहाबाद ने। लेकिन उस शहर का मिज़ाज नहीं बदला। लोगों के रहन-सहन की तासीर नहीं बदली। लोगों का अपनापन अब भी कायम है। गली के मोड़ पर खड़े काका, ताऊ या दादा या भैया जैसे आत्‍मीय आपको नसीहत की घुट्टी पिलाने के लिए आज भी तत्‍पर मिल जाएंगे। एक सवाल के जवाब में दस बातों की व्‍याख्‍या ज़रूर कर डालेंगे।


पड़ोसी के घर की रसोई में क्‍या पक रहा है, ये सहज जिज्ञासा आज भी कायम है। भागमभाग के इस युग में भी दफ्तर या अपने गंतव्‍य को जाते हुए लोग आज भी पान की दुकान से बीड़ा या दोहरा मुंह में भरकर ही आगे बढ़ते हैं। मालवीय नगर की संकरी गलियों में भी लोग अपनी कार ज़रूर ले जाएंगे। भले ही उसकी वजह से उन्‍हें ट्रैफिक जाम में कई घंटे बरबाद करने पड़ जाएं। अनियंत्रित, बेतरतीब ट्रैफिक में फंसे लोग....ना तो ट्रैफिक रूल से शिकायत करते हैं ना ही उनका पालन करते हैं। लेकिन वे अपने जीवन से बेहद संतुष्‍ट हैं।



लोकनाथ के ढाल पर भारती भवन लाइब्रेरी आज भी पुराने रंग रोगन में मौजूद है। उसके इर्द गिर्द हरी नमकीन, समोसे वालों की दुकान और तरह तरह के मसालों की गंध बिखरी है आज भी। अब भी हम वहीं से दम-आलू और कचौड़ी के मसाले और हींग वग़ैरह ख़रीदकर मुंबई की अपनी रसोई तक ले आते हैं। हालांकि सिविल लाइंस के इलाक़े में मॉल भी बन गए हैं, बड़े बड़े शोरूम खुल गये हैं। पहनावे पोशाक में भी खूब फर्क आ गया है लेकिन नहीं बदली है वहां की आत्‍मीयता। नहीं बदला है वहां का सुकून। आज भी लोग छत पर बैठकर मूंगफली और अमरूद खाते हैं। आज भी बेटी जब मायके आती है तो अड़ोसी-पड़ोसी छत से झांकते हैं और फिर मिलने चले आते हैं। फुरसत से खूब बतियाते हैं। सवालों की झड़ी लगा देते हैं। बेहद निजी बातें भी वो इतने अधिकार से पूछते हैं कि जिनके बारे में आपने कभी खुद से भी गुफ्तगू ना की हो।



सुकून, प्रेम और स्‍नेह की त्रिवेणी आज भी बहती है इलाहाबाद में। शायद इसलिए अपनी प्रिय मायानगरी, कर्म की नगरी में आकर भी मन का एक सिरा वहीं रह जाता है.... जहां भाई-बहनों के साथ घंटों बैठकें होती हैं। तमाम व्‍यस्‍तता और आधुनिकता के बावजूद आज भी, लाख मना करने पर भी भाभी अपने हाथों से पैरों में महावर लगाकर प्‍यार के रंग से तन-मन भर देती हैं। मायके और ससुराल की यादों से भरा है मन का पिटारा.... जिसमें छलक रहे हैं खुशियों के रंग।



मायका गंगा-जमना किनारे है तो ससुराल नर्मदा तीरे। नर्मदा मैया का सान्निध्‍य कम मिला, लेकिन जब गये भेड़ाघाट तो आसमान की ओर उड़ते पानी के छोटे छोटे कणों को देखते ही रह गये। उपमा से परे..... वर्णन से परे.... फेनिल झाग वाले पानी से... उड़ती बूंदों से इस कदर भीगे कि वो नमी अभी भी महसूस हो रही है मन के आंगन में। इस बार मायके और ससुराल का सफर अदभुत और यादगार हो गया।