Tuesday, November 24, 2009

डायरी के कुछ पन्‍ने-'मां का विदा हो जाना'

पिछले कुछ महीनों में मन जैसे भर-सा गया है । मां की बीमारी और फिर उनके अवसान के दिनों में मैंने जो डायरी लिखी उसके कुछ पन्‍ने यहां छाप रही हूं । पिछले पन्‍ने पर मैंने मां की बेबसी, बीमारी और उनके व्‍यक्तित्‍व के कुछ पहलुओं को उजागर किया था । अब आगे...
--ममता

इन दिनों मां बहुत बीमार चल रही हैं । हम इलाहाबाद जाने की तैयारी कर रहे हैं । उनसे मिलने की इच्‍छा तीव्र होती जा रही है । अपने छोटे-से बच्‍चे को लेकर जाने में उहापोह चल रही है कि कैसे जाएं, कब जाएं । मां की हालत काफी गंभीर हो चुकी है । टिकिटों की व्‍यवस्‍था की ही जा रही है कि अचानक ख़बर आई है कि वो अब इस संसार में नहीं रहीं ।

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माई संसार में नहीं रहीं । हमें मालूम है कि वो पंच-तत्‍वों में विलीन हो गयीं लेकिन फिर भी उनके होने का अहसास ऐसा गहरा है, लग रहा है कि वो मेरे पास हैं । कभी उनकी आवाज़ सुनाई देती है । लगता है वो बुला रही हैं—‘कहो ममता, अबकी कब अऊबू । बच्‍चा कैसन अहै, अ मेहमान ? नित नित का आसीरबाद’ । कभी कहती हैं—‘बेटवा को ना, माथे के

मां के अंत के साथ तमाम पौराणिक ज्ञान का अंत हो गया । तमाम आध्‍यात्मिक बातों का अंत हो गया । उन तमाम नुस्‍खों का अंत हो गया, जो वे हमें घर परिवार के लिए बताया करती थीं ।

बीचोंबीच काला टीका ना लगाओ । बगल में लगावा
कर ।’ ‘सोवत की अकेल जिन छोड़ा करा’ । ‘रोज़ संझा के नजर उतार देवा करा ।’ बेटे की परवरिश और परंपराओं-त्‍यौहारों से जुड़ी हुई और भी तमाम बातें । जो ना तो हमें डॉक्‍टर बतायेंगे ना ही हमारे परिवार के और कोई सदस्‍य ।
मां के अंत के साथ तमाम पौराणिक ज्ञान का अंत हो गया । तमाम आध्‍यात्मिक बातों का अंत हो गया । उन तमाम नुस्‍खों का अंत हो गया, जो वे हमें घर परिवार के लिए बताया करती थीं । पहले किसी भी तरह के पारंपरिक ज्ञान की कोई ज़रूरत पड़ती थी तो फौरन उन्‍हें फोन लगा लिया जाता था । और पक्‍की जानकारी मिल जाती थी । लेकिन अब इस तरह की कोई भी जानकारी पाने के लिए कोई ऐसा सूत्र नज़र नहीं
आता । बेटे को हिचकी आती थी और मैं उससे कहती थी कि नानी याद कर रही हैं तो वो मुस्‍कुरा देता था । लेकिन अब जब अनायास खूब रोता है तो मैं उससे पूछती हूं, बेटा कौन याद कर रहा है, बेटा तो कोई जवाब नहीं देता लेकिन मेरी आंखें धार-धार बरसने लगती हैं ।

बार-बार लगता है—‘मां जिस रूप में भी थीं, चाहे जितनी बीमार थीं, थीं तो एक संबल के रूप में । बहुत बड़ा सहारा थीं वो । पूरे परिवार को एक सूत्र में जोड़ने वाली थीं । उनके जाने से वो संबल टूट गया । वो सूत्र भी कमज़ोर हो गया, जिससे पूरा परिवार जुड़ा हुआ था । परिवार में किसी

कोई ऐसा गीत गुनगुनाने की कोशिश करती हूं जिसमें ‘मां’ शब्‍द ना आए । लेकिन फिर भी ऐसा लगता है जैसे वो सामने आकर खड़ी हो गयी हैं और होंठ कांपने लगते हैं, आंखें भीग जाती हैं

की किसी से खटपट हो जाए तो वे जोड़ने का काम करती थीं । उस शख़्स की अनुपस्थिति में समझाती थीं कि फलाना मन का बहुत अच्‍छा है । उसको फ़ोन कर लिया करो, बातें कर लिया करो । उनका भले ही किसी ने दिल दुखाया हो, लेकिन वो किसी का दिल नहीं दुखाती थीं । एक बार भैया की तबियत ख़राब हो गयी थी, जिनके साथ वो इलाहाबाद में रह रहीं थीं । भैया को हैजा हो गया था, मां खुद भी बीमार चल रही थीं । भैया को असंख्‍य उल्टियां हो रही थीं । और मां अपनी बीमारी को, अपनी जर्जर अवस्‍था को अनदेखा करते हुए घर से निकलीं और दौड़ पड़ी डॉक्‍टर को बुलाने । डॉक्‍टर नहीं मिले, तो रिक्‍शा ले आईं ताकि भैया को किसी और डॉक्‍टर के पास ले जाया जा सके । फिर तो भाभी और परिवार के लोग जमा हो गये, लेकिन तुरंत जो हिम्‍मत बीमारी के बावजूद उन्‍होंने दिखाई उससे भैया का स्‍वास्‍थ्‍य तुरंत ठीक किया जा सका ।

बड़ी जीवट की थीं मेरी मां । उनकी इच्‍छा-शक्ति बेहद मज़बूत थी इसलिए कई बार वो गंभीर-अवस्‍था तक पहुंचकर भी पुन: स्‍वस्‍थ हो गयीं । घर-परिवार के लोगों की बीमारी में रात-रात भर अपनी नींद गंवा देने वाली मेरी मां ने जाने से पहले वाली रात बैठकर बेचैनी में बिताई । सोईं नहीं रात भर । जिस दिन वे गईं, हॉस्पिटल जाने से पहले अपना दैनिक-कर्म स्‍वयं किया । यहां त‍क कि नहाना-धोना भी अपने हाथों से किया । घर वालों के सहारे से । इतनी बड़ी बीमारी के बावजूद, जैसे कहीं जाने के लिए अपने-आप तैयार होती थीं, उसी तरह से तैयार हुईं । और घर से डॉक्‍टर के पास गयीं । लेकिन डॉक्‍टर के पास से घर तक सकुशल नहीं पहुंच सकीं । अपनी इच्‍छा के मुताबिक़ घर के पास मंदिर के सामने उन्‍होंने संसार से विदा ली ।

अपना चेहरा घुमाओ, पीछे मुड़कर देखो तो लगता है, मां खड़ी हैं । अगल-बगल किसी भी तरफ़ देखो, तो जैसे मां यहीं पर हैं । इस वक्‍त कुर्सी के पीछे भी वे खड़ी हैं । फिर जैसे कंप्‍यूटर की स्‍क्रीन पर आ गयी हैं । लगता है वे हमें देख रही हैं । हम क्‍या कर रहे हैं, बस अभी कोई सवाल वो पूछ बैठेंगी । पीछे मुड़कर देखते हैं, कोई नहीं दिखता । सिर्फ उनका अदृश्‍य अहसास । और मैं उदास हो जाती हूं । डर जाती हूं । उनकी यादों से उबरने की कोशिश करती हूं । कोई ऐसा गीत गुनगुनाने की कोशिश करती हूं जिसमें ‘मां’ शब्‍द ना आए । लेकिन फिर भी ऐसा लगता है जैसे वो सामने आकर खड़ी हो गयी हैं और होंठ कांपने लगते हैं, आंखें भीग जाती हैं, और वो कहती हैं—‘तुम क्‍यों इतनी दुखी हो, छोटा- बच्‍चा है । उसका ध्‍यान रखो । तुमने तो मेरे लिए बहुत किया ना ममता, बेटी होकर इतना क़र्ज़ा दे दिया है, अब कैसे उतारूंगी । देखो बेटों से कह आईं हूं, शायद वो तुम्‍हारा क़र्ज़ा उतार देंगे तो मैं निश्चिंत हो जाऊंगी’ ।

दरअसल मैं जब भी इलाहाबाद जाती तो उनके हाथ में कुछ पैसे पकड़ाकर आती । उनकी जितनी भी दवाईयां-टॉनिक होते, ख़रीदकर आती । उनसे रोज़ पूछती थी, क्‍या खाना है, लाकर देती थी । डॉक्‍टर का प्रिस्क्रिप्‍शन देखकर उन्‍हें सलाह देती थी । ये टॉनिक है, ये रोज़ लेना । ये दवा है इतने ही दिन खाना । और जो भी उनकी पसंद की चीज़ होती थी वो उन्‍हें खिला देती थी । बस इतने में ही वो गदगद हो जाती थीं । निहाल हो जाती थीं । ऐसा नहीं है कि भाई-भाभी उनका ध्यान नहीं रखते थे । लेकिन मेरी इन छोटी-छोटी कोशिशों का सुख उनके लिए बड़ा अनमोल था ।


शशिभूषण जी, पिछले पन्‍ने पर आपने टिप्‍पणी में जो कविता भेजी, वो इतनी मर्मर्स्‍पशी थी कि उसे पूरा पढ़ने से पहले ही मेरी आंखें डबडबा
गयीं । जिन लोगों ने अपने विचार दिए, उन सभी का आभार ।


--तीसरे भाग में जारी

Sunday, November 22, 2009

डायरी के कुछ पन्‍ने : 'मां की बीमारी'


पिछले कुछ महीनों में मन जैसे भर-सा गया है । मां की बीमारी और फिर उनके अवसान के दिनों में मैंने जो डायरी लिखी उसके कुछ पन्‍ने यहां छाप रही हूं--ममता


मुझे लगता है कि उम्र के एक पड़ाव पर आकर हर कोई एकाकी हो जाता है । किसी बुज़ुर्ग को अगर क़रीब से देखें तो ये बात बड़ी गहराई से महसूस होती है । मैं जब भी अपनी मां को देखती हूं तो लगता है‍ कि वो बड़ी अकेली हैं, बड़ी बेसहारा हैं, उनका बड़ा सा परिवार है, बेटे-बहू, बेटी-दामाद, नाती-पोते, नाती के भी बच्‍चे वे देख चुकी हैं । हाल ही में अपने एक और नवजात नाती यानी मेरे सुपुत्र को गोदी में खिलाकर निहाल होने का सुख पा लिया है ।

mai fotos 003                भैया के बच्‍चों, अनुवर्तिका और देवव्रत के साथ मां



फिर भी ना जाने क्‍यों उनकी आंखें जब-तब शून्‍य में ताकने लगती हैं । वे आंखें बंद करके पलके झपकाने लगती हैं तो  लगता है कि वो सो रही हैं । दरअसल वो सो नहीं रही होती हैं बल्कि उस वक्‍त वो दुनिया-जहान की बातें सोचती हैं, बीते कल को याद करती हैं, वर्तमान की खट्टी-मीठी

देखते ही देखते उनका ‘रौबदार’ रूप एक ‘निरीह’ रूप में ढल गया । बचपन पीछे छूट गया, हम बड़े हो गए । हम भाई-बहनों को उंगली पकड़कर सब-कुछ सिखाने वाली मां हमीं लोगों से सीखने लगीं ।

घटनाओं के भंवरजाल में डूबती-उतराती रहती हैं, बेटे-बहुओं के भविष्‍य के बारे में सोचती हैं, मेरे बारे में सोचती हैं और जाने किस-किस के बारे में सोचती हैं । हालांकि अब वो कम बोलती हैं लेकिन उनकी आंखें जैसे हर वक्‍त कुछ कह रही हों । इस समय वो बड़ी बीमारी से जूझ रही हैं । मेरे पिताजी जिन्‍हें हम ‘बाबा’ कहते थे, बहुत जल्‍दी ही उन्‍हें अकेला छोड़ इस असार-संसार को अलविदा कह गए थे । हम कई भाई-बहन मिलकर उनका संबल बने । लेकिन मुझे लगता है कि वे हम-सबका भरा-पूरा साथ पाकर भी भीतर से निपट अकेली ही रही हैं । धीरे-धीरे उनका अकेलापन गहराता ही गया है ।

कई बार उनके अतीत को जब हमने कुरेदने की कोशिश की
तो वे बड़ी भावुक हो उठतीं । पिताजी से जुड़ी तमाम यादें बांटते हुए मुस्‍करा उठतीं, कभी रूंआसी हो उठतीं । और बातों-बातों में ये जता देतीं कि हमारे ज़माने में पति-पत्‍नी का प्‍यार सिर्फ़ चार-दीवारी के भीतर क़ैद होता था । घर-परिवार के लोग जान भी नहीं पाते थे कि ये लोग आपस में कितना प्यार करते थे । वे बतातीं हैं कि जब वो ब्‍याहकर आईं थीं तो सिर्फ़ तेरह साल की थीं । बड़ा परिवार, ज़मींदारी-प्रथा, रीति-रिवाज़ों और परंपराओं को निभाते, धन-दौलत को संभालते-संभालते कई बच्‍चों की मां बन गयीं ।

किशोरावस्‍था से कब उनका यौवन आया, कब बुढ़ापा और कब बुढ़ापे से वे जर्जर हो गईं, उन्‍हें पता ही नहीं चला । हर दौर में बड़ी कुशलता से अपनी जिम्‍मेदारी निभाती रहीं वे । कभी सुघड़-पतिव्रता पत्‍नी बनीं, कभी कुशल बहू, ममतामयी मां और फिर सास, दादी, नानी सब-कुछ बनीं । जिंदगी के हर किरदार को उन्‍होंने बड़े अच्‍छे-से निभाया । अपने बच्‍चों को पढ़ाया-लिखाया, पैरों पे खड़ा किया । और जब बन गईं सास, तो फिर-से दौर आया पालन-पोषण का, अपने पोती-पोतों की परवरिश की जिम्‍मेदारी उन्‍हीं के कंधों पर आई । कभी उन्‍होंने ‘उफ़’ नहीं की  । हर दौर की जिम्‍मेदारी को उन्‍होंने स्‍वयं अपने ऊपर ओढ़ लिया ।

मैं सोच रही हूं कि उन्‍होंने अपने लिए कब जिया । अपने लिए कब खुश हुईं । क्‍या कभी उन्‍होंने खुद के लिए कोई सुख बचाकर रखा । कोई ऐसी खुशी उन्‍होंने अपने भीतर सहेजी जो सिर्फ उनसे जुड़ी हो । यहां तक कि धन-वैभव भी उन्‍होंने सबको बांट दिया । बार-बार मेरे ज़ेहन में ये बात आ रही है क्‍या मेरी-मां सिर्फ़ दूसरों के लिए ही जीती हैं ।

कभी-कभी जब नाती-पोतों को किसी ग़लती पर डांटतीं और भाभी को अच्‍छा नहीं लगता तो हम उन्‍हें सलाह देते कि आपको टोक-टाक करने की ज़रूरत क्‍या है । यही बात हम उन्‍हें तब समझाते थे जब घर में कुछ उनकी मरज़ी या इच्‍छा के खिलाफ़ होता और वो अपनी नाराज़गी जाहिर
करतीं । यहां तक कि उन्‍हें पड़ोसियों की भी चिंता होती थी ।

मुझे लगता है कि वे सिर्फ़ अपनी ही चिंता नहीं करतीं थीं, बाक़ी सारे लोगों की चिंता करती थीं, किसने समय पर खाना नहीं खाया, कौन समय पर घर नहीं आया, किसकी तबियत ख़राब है, किसको दवा की ज़रूरत
है । लेकिन जब अपनी बारी आती, तो सोचने के लिए उनके पास कुछ होता ही नहीं था । शायद उन्‍हें लगता था कि उनके बारे में कोई और
सोचे । लेकिन उन्‍हें ये बात समझ नहीं आती थी कि उनके ज़माने में और आज के ज़माने में फ़र्क़ है । पहले के लोग सिर्फ़ परिवार के लिए जीते थे । आज के ज़माने में पहले अपने लिए फिर परिवार के लिए जिया जाता है ।

मैंने अपने बचपन में अपनी मां का एक रूप देखा था जो बड़ा ही दबंग
था । बिल्‍कुल हेड-मिस्‍ट्रेस जैसी दिखती थीं । हम भाई-बहन उनकी निगाहों का सामना करने से डरते थे । हालांकि मैं उनकी सबसे लाड़ली
थी । कई बार तो वो छड़ी से सबको मारती थीं तो मैं उनसे पूछती थी कि मुझे भी मारोगी । इस पर वो बोलती तो कुछ नहीं थीं लेकिन मुझे मारती नहीं थीं । क्‍योंकि मैं बहुत शरारती नहीं थी । मुझे तो उनकी मार नहीं याद है लेकिन मेरे भाई-बहनों को बड़ी मार पड़ी है । देखते ही देखते उनका ‘रौबदार’ रूप एक ‘निरीह’ रूप में ढल गया । बचपन पीछे छूट गया, हम बड़े हो गए । हम भाई-बहनों को उंगली पकड़कर सब-कुछ सिखाने वाली मां हमीं लोगों से सीखने लगीं । हमीं लोगों से हर क़दम पूछ-पूछकर रखने लगीं । किसी के घर जाना है तो भैया से पूछतीं—जायें कि नहीं । कुछ खाने का मन हो, तो दूसरों से पूछतीं थीं कि आज ‘पकौड़ी’ या ‘कढ़ी’ खाने का तुम्‍हारा मन है क्‍या । बना ली जाए क्‍या ।

मुंबई से जब मैं जाती थी तो अकसर वे मुझसे कढ़ी खाने को ज़रूर पूछतीं थीं—‘ममता कढ़ी खाने का मन है क्‍या’ । पूछने का दूसरा तरीक़ा होता था—‘मेहमान’ (मेरे पति महोदय) के लिए कढ़ी बना दें क्‍या । और मैं सीधा-सा जवाब देती—‘नहीं नहीं कहां परेशान होंगी, सादा खाना भाभी जो बनायेंगी, वही खा लेंगे, आप कहां परेशान होंगी ।’ लेकिन बाद में मुझे ये अहसास हुआ, कि उनकी खुद की भीतर से इच्‍छा होती थी । लेकिन पुरानी प्रथाओं और मान्‍यताओं को मानने वाली मेरी मां स्‍वेच्‍छा से अपने लिए कुछ नहीं बनाती थीं । ये बात मुझे बहुत बाद में महसूस हुई । जब मुझे इस बात का अहसास हुआ तो मैं उनसे कहने लगी कि आखिर आप अपने लिए कुछ क्यों नहीं करतीं । आप दूसरों के बहाने से अपनी इच्‍छा क्‍यों पूरी करना चाहती हैं । आप खुद अपनी इच्‍छा पूरी कीजिए ना । इस पर उनका जवाब होता था—‘अगर अपने लिए जिए होते, तो सोने की अनगिनत अशर्फियां मेरे पास होतीं । अपने लिए मैंने क्या बचाया । पहले तुम लोगों की दादी जो कहती थीं वो करते थे, फिर तुम्‍हारे पिताजी और अब बेटे जो कहते हैं वो करती हूं ।’

--दूसरे भाग में जारी