Batkahi Radiosakhi Mamta Singh ki

Monday, April 4, 2016

ठंडा मतलब..............

बारिश का एक छींटा पड़ा नहीं कि पूरा मीडिया उसकी ब्रेकिंग न्‍यूज़ देने लगता है। सोशल नेटवर्किंग पर भी होड़-सी लग जाती है। गरमी आती है, तो उस बेचारी को कोई दो कौड़ी को नहीं पूछता। जबकि गरमी के मौसम पर तमाम बड़े साहित्‍यकारों ने खूब रचा और लिखा है...भले ही दुखद या मार्मिक हो। अब हमारे इलाहाबाद के निरालाजी ने लिखा था-
       
वह तोड़ती पत्‍थर, मैंने उसे देखा इलाहाबाद के पथ पर.....

अब इसमें भी झुलसती गरमी ही तो है। बहरहाल हम जो कहना चाहते हैं
, वो ये कि गरमी है तो बुरी, लेकिन इस मौसम की ख़ासियत बड़ी अनोखी है.. बड़ी सुहानी यादें हैं....जैसे-जैसे पलाश सुर्ख़ लाल होता, बाग़ों में कोयल कूकती, आम बौराते, घर के आंगन में सिल-बट्टे पर कच्‍चे आम की चटनी पीसी जाती…….परीक्षाओं का बुख़ार तेज़ होता जाता.....बदहवासी बढ़ती जाती.....लू के थपेड़े बढ़ते जाते। गरमी की उन लंबी बोझिल दोपहरियों में जब सारा घर सो रहा होता, तो हम झूम-झूमकर ऊंघते हुए पाठ याद कर रहे होते.....। तब ठंडक बिखरने वाले ए.सी. विरले घरों में होते। होते थे तो कूलर। उसमें भी बारी लगती कि कूलर के सामने की बेस्‍ट सीटकिसे और कितनी देर मिलेगी। इस बात पर सब कुनमुनाते थे कि आज कूलर में पानी भरने की बारी किसकी हो। तब मटके और सुराही का पानी तरावट देता था। तब उपभोक्‍तावाद ने अपने पैर नहीं पसारे थे। तब ठंडा मतलब एक ख़ास साफ्ट ड्रिंक नहीं, बल्कि मां के हाथ का बेल का शर्बत या जलज़ीरा या फिर ठंडई हुआ करता था, जिसे पीते ठंडक का करंट’-सा दौड़ा करता था। कुल्‍फ़ी और रीटा आइसक्रीमवाले की बांग सुनकर भाई-बहन अपनी-अपनी गुल्‍लक से पैसे निकाल दौड़ पड़ते थे ख़रीदने। 


सबसे प्रिय याद है गन्‍ने का रस। तब गन्‍ने का रस निकालने के लिए आज जैसी मशीन नहीं थी।
चड़क-चूं, चड़क चूंजैसी आवाज़ करती लकड़ी से बनी चरखी होती थी, जिसमें गन्‍ने का समूचा लट्ठा ठूंसा जाता था और उस पर बंधा घुंघरू छुनमुन छुनमुनकरता रहता रहता। तब जिंदगी में लय थी और ताल था....मुश्किलें थीं लेकिन तब जिंदगी बहुत आसान थी। आज की तरह शॉर्ट-कट वाले रास्‍ते नहीं थे। भागमभाग नहीं थी। तसल्‍ली थी, सुकून था। यूनिवर्सिटी जाते हुए रिक्‍शे के कई स्‍टॉपों में पहला स्‍टॉप होता था गन्‍ने का रस। जहां पर इत्‍मीनान से रिक्‍शा रूकता और गन्‍ने का रस निकालने वाले भैया ग्‍लास थमा देते और हम अपनी बहन या सहेलियों के साथ आराम से बैठकर रस पीते। वो आनंद आज के फाइव-स्टार होटलों में कहां। और हां...गन्‍ने के रस में अलग से बर्फ़ का टुकड़ा, पुदीने और लाल मिर्चे वाला नमक डालने पर उसका स्‍वाद कई गुना बढ़ जाता था। महानगरीय सभ्‍यता में जैसे ये एक सपना ही रह गया है। अब तो हम बैक्‍टीरिया और जीवाणु कॉन्‍शस हो गए हैं। तब इन सबके बारे में ना तो जानकारी थी, ना परवाह।

इलाहाबाद के लोकनाथ चौराहे पर लगे चाट के ठेले के सामने खड़े होकर मस्‍त पानीपुरी और टिकिया भर पेट खाते
, घर जाकर दोनों बहनें कहतीं—आज भूख नहीं है, खाना नहीं खायेंगे। भाभी तुरंत कहतीं—लगता है आज तुम लोगों का रिक्‍शा लोकनाथ की ओर से आया है। इसी तरह तपती-झुलसती गरमी में जब हम रिक्‍शा खोजते हुए गली-से बाहर आते, तो सामना होता लाल कपड़े में लिपटे मटके के  जलज़ीरे और छोटी-छोटी दुकानों से आती विविध-भारती की सुरीली टेर से। रूककर हम फ़रमाईशी नाम सुनते थे। झुमरी-तलैया से फलाने, बरकाकाना से फलाने। उन दिनों की उद्घोषिका कांता गुप्‍ता की आवाज़ सुनकर हमारे पांव ठिठक जाते। कई बार उनकी अगली उद्घोषणा सुनने के लिए वहीं खड़े होकर पूरा गाना भी सुन डालते। कुछ ख़ास किस्‍म की उनकी बोलने की शैली थी, जो बड़ी लुभाती थी। एक गन्‍ने के रस और जलज़ीरा पीने के बहाने हम जीवन और शहर के कितने रंग और रूप देखते थे।

सोचती हूं.... गन्‍ने की मेरी यादों के पिटारे में मां के हाथ का बनाया बेल का शरबत
, गन्‍ने का रस और सत्‍तू है, अचार है, ठंडाई है, पना है, चटनी है, खाने-पीने का एक अनोखा सतरंगी ख़ज़ाना है। बड़े होने पर मेरे जादू और उसके दोस्‍तों की यादों में क्‍या होगा.....गन्‍ने का रस क्‍या बेदख़ल हुआ, एक साथ हमारी जिंदगी से कितना कुछ चला गया।  

Thursday, December 10, 2015

स्‍कूल का 'तमाशा' और 'तमाशा' का स्‍कूल


जिंदगी भी कई बार किस तरह से आइना दिखाती है। पिछले शनिवार को अजीब इत्‍तेफाक हुआ। सुबह जादू के स्‍कूल गए, पैरेन्‍ट-टीचर-मीटिंग में, जिसे ओपन-हाउस भी कहते हैं। उम्‍मीद तो यही थी कि शिकायत सुनने को मिलेगी कि जादू बहुत मस्‍ती करते हैं, He is very naughty but he is good at studies. लेकिन इस बार दो टीचर्स ने एक ही बात कही, nowadays he is very quiet. He does very good behavior. मेरा माथा थोड़ा ठनका। इंग्लिश टीचर ने आश्‍चर्य भी जताया कि आजकल वो बड़ा शांत रहने लगा है। लेकिन मैथ टीचर, जो क्‍लास-टीचर भी है- इस बात से खुश थी कि जादू आजकल शांत बैठने लगा है। पहले उसकी मस्‍ती और शरारतों से पूरी क्‍लास डिस्‍टर्ब होती थी। जादू के साथ दो बच्‍चों का नाम और शामिल था। खुद तो फास्‍ट क्‍लास-वर्क कर लेता था, फिर दूसरों को डिस्‍टर्ब करता था।

दरअसल इसके पहले क्‍लास में शरारत और बाहर दौड़ने पर उसे कई बार छोटी-मोटी सज़ा मिली। जैसे हेड-डाउन करना या किसी कोने में खड़े कर दिये जाना। जबकि जादू को पढ़ाई के लिए हमेशा हर टीचर से स्‍टार और स्‍माइली मिलता रहा है। हर PTM में यही बात सुनने मिली कि पढ़ने में अच्‍छा है इसलिए हम लोग सज़ा वाली बात से ज्‍यादा परेशान नहीं होते थे लेकिन एक बार डायरी में रेड-रिमार्क लिखकर आया। मुद्दा ये था कि बच्‍चा आई-कार्ड से खेलता है और क्‍लास से बाहर वॉश-रूम तक दौड़कर ही जाता है। अपने प्‍लेस से अपने बेस्‍ट-फ्रेन्‍ड के पास बार-बार चला जाता था। इस एक रेड रिमार्क से हम दोनों परेशान-चिंतित। जादू के पापा को ज्‍यादा चिंता। हालांकि मुझे लगातार ये लगता है कि इतने छोटे बच्‍चे मस्‍ती और शरारत तो करेंगी ही........बहरहाल हम लोगों ने जादू को घुट्टी पिलाना शुरू कर दिया--'क्‍लास में अपनी जगह पर बैठो', 'क्‍लास में खेलो मत', 'टीचर की बात ध्‍यान से सुनो' वगैरह वगैरह। शायद जादू ने काफी हद तक हमारी आज्ञा और सलाहों का पालन भी किया। जबकि मुझे लगातार ये गिल्‍ट रहा कि बच्‍चे के साथ ये सब ज्‍यादती है। हम बच्‍चे पर ये सब कह कर प्रेशर डालते हैं और इससे उसका बचपन छिन रहा है। हमारी त्रासदी है कि स्‍कूल के मुताबिक़ हम शुरू से ही बच्‍चे को कल्‍चर में ढालने लगते हैं। तहज़ीब, शिष्‍टाचार का पाठ बहुत जल्‍दी पढ़ाने लगते हैं कि कहीं हमारा बच्‍चा सभ्‍यता और आधुनिकता की सीढ़ी चढ़ने में या 'गुड बॉय' बनने में पीछे ना रह जाए। मध्‍यमवर्गीय सोच, स्‍कूल की संस्‍कृति, पहनावा, पश्चिमीकरण में बिल्‍कुल फिट हो अपना बच्‍चा। दोहरी मानसिकता और दोहरे मानदंड के बीच हमें अकसर अपने मूल संस्‍कारों का गला घोंटना पड़ता है। हम जानते समझते हुए भी अपने बच्‍चे को आधुनकिता की अंधी दौड़ में शामिल होने के गुर पहली क्‍लास क्‍या, नर्सरी से ही सिखाने लगते हैं। फिर भी मेरा मन हमेशा कहता है कि बच्‍चे पर ज़रूरत से ज्‍यादा कल्‍चर, एटीकेट थोपना उनसे उनका बचपन छीनना है। 

बहरहाल... इस PTM में जादू की भूरि-भूरि प्रशंसा सुनकर जी जुड़ा गया। जबकि उनकी साइंस मिस ने ये भी कहा कि मुझे तो हाइपर-एक्टिव बच्‍चे ज्‍यादा पसंद हैं इसलिए जादू उनका फेवरेट है। वो उनकी हर बात एक बार में समझ लेता है और जब वो दूसरी-तीसरी बार समझाती हैं- तो इस बीच जादू खिड़की से बाहर देखता है, पेन्सिल शार्प करता है या अपने आप में मगन हो जाता है। क्‍योंकि टीचर का दूसरी-तीसरी बार बोलना जादू के लिए बेकार है। उसे एक ही बार में पूरी जानकारी मिल जाती है। इस बात से टीचर खुश है। बाक़ी समय वो अपनी दुनिया में मगन है। मैं तो स्‍कूल से निहाल होकर लौटी लेकिन ये क्‍या......

शाम को गये 'तमाशा' देखने। 'तमाशा' ने तो असली तमाशा दिखा गया। मन के कई तार झंकृत कर दिये। दिमाग़ के कई दरवाज़े खोल दिये। इस फिल्‍म ने हम सबकी शख्सियत को बड़ी बारीकी से आइना दिखा दिया। बच्‍चे के जिस मनोविज्ञान को हम कभी जानने की कोशिश भी नहीं करते, वो मनोविज्ञान कितना विशाल है। बच्‍चे के मन का आकाश कितना बड़ा और कितना विस्‍तृत है। उनमें कितनी समझदारी है। फिर भी हम उस पर थोपते हैं सब कुछ। सब कुछ थोपकर अपनी बात मनवा लेते हैं.... खैर 'तमाशा' की विवेचना करने चले तो हमारी ये लेखनी बहुत बड़ी हो जाएगी। इसलिए बस इतना कहना चाहूंगी कि बड़ी बारीकी से हम सबकी जिंदगी के तमाशे को दिखाया गया है इसमें। वेद का किरदार हम सब भी रोज़ अदा करते हैं लेकिन तारा के बारीक जज्‍बात को बहुत कम ही लोग समझ पाते हैं।

इम्तियाज़ अली की 'तमाशा' ने बड़ी खूबसूरती से हम सबके बचपन को ताज़ा किया है... किस्‍सगोई के शौक़ को ताजा किया है। बड़ी समझदारी और कुशलता से ये भी संदेश दिया है कि मत कुचलो बचपन की मासूमियत। बच्‍चों पर अपनी काबलियत को मत थोपो। बच्‍चों को व्‍यावहारिकता, शिष्‍टाचार के फ्रेम में मत क़ैद करो। वरना वो जीती-जागती तस्‍वीर बन जाएंगे। एक ऐसा पुतला जो सपने में भी सॉरी थैंक्‍यू का पाठ पढ़ते नज़र आयेगा। जहां इस बात का तनाव भी है कि अब बड़े होकर उन्‍हें अच्‍छे मैनर सीखने चाहिए। सबसे अहम बात ये है कि अपने बचपन को अपने आप से कभी जुदा ना करो। फिल्‍म 'तमाशा' की तारीफ में क्‍या कहूं.... इस फिल्‍म को देखने के बाद मैंने ये तय किया है कि खुद के बचपन को संभालकर रखूंगी बल्कि नन्‍हे जादू को उड़ने के लिए वृहद आकाश दूंगी। अपनी कल्‍पनाओं को बुनने का स्‍पेस दूंगी। 'गुड बॉय' का भारी-भरकम कोट पहनाकर 'कल्‍चर' और 'एटीकेट' के दायरे में क़ैद नहीं करना है अपने जादू को। उसे बस मस्‍त रहने देना है। 'हाइपर' और 'नॉटी' का टैग जादू के साथ जोड़े रखना है।